लव प्रोपोसल के लिए...
इश्क की जिए हमसे वो जानेमन जी नहीं सकते आपके
बिना...
नशा-ए-हसीं दीजिये हमको शराब के एक बूँद पिए बिना...
गुज़रता हूँ हर रोज़ आप की गलियों में...
दुवा मांगता हू कूड़ा से आपकी नूरानी चहरे की एक झलक
के लिए...
जहांनुम लगता हैं ये जहां आपकी नाजूक पैर उसपे चलें
बिना...
दर लगता हैं ए नाज़नी मर ना जावूँ आपको पाए बिना...|
शादी किया तो...
कहते हैं वतन-ए-हिन्दुस्तान के जहापना हम हैं
पर हम उनमें से हैं जिसको गुलामी में ही सुकून हैं
उस लम्बे काले ज़ुल्फूं की जंजीरों से बांधा हवा
उस कातिल आखों की तहकाने में बसा हुवा
हां हम गुलाम हैं...
हम तो गुलाम हैं उस हसीना की जो हैं हमारे सल्तनत-ए-दिल की मल्लिका
हम गुलाम हैं हमारे बेगम का...
और हमे फक्र मेह्सूज़ होता हैं की ये एलान करते हुवे...
की हम ता-क़यामत हमारे बेगम की गुलाम बनके रहेन्गे...
और ले जाए तो ले जाए वो हमे खींच के जहांनुम में...
जब तक इश्क हैं करार हमारे जिगर में...
हम जहांनुम में भी एक ताज महाल बनादेंगे...|
लव फेलियर हुवा तो...
उस की ना मिलना मुनासिब हैं...
मेरा दिल टूट जाना मुनासिब हैं...
इश्क हैं नहीं मुनासिब हर किसी को...
ये ज़हरीला सच ता-क़यामत मुनासिब हैं...|

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